ज्ञान सम्प्रदाय के संस्थापक कुवेरास्वामी का प्रागट्य संवत 1829 में महासूद दुज के दिन गुजरात राज्य के भालेज के पास कासोर गांव की वनखंडी में हुआ था। बालक के रूप में उनकी मुलाकात हेतबाई नामक क्षत्रियाणी से हुई, क्योंकि उन्हें पूर्व जन्म में कल्याण का वरदान मिला था। सात वर्ष की आयु में उन्होंने गुरु परंपरा का सम्मान करते हुए कृष्णास्वामी गुरू को अपना गुरु स्वीकार किया और सकर्ता द्वारा निर्दिष्ट कल्याणकारी कार्य का प्रारंभ किया । उन्होंने छोटी उम्र से ही प्रभात और मंगल पद की रचना कर अंश-अंशी लक्ष का ज्ञान दुनिया को देना शुरू कर दिया था। 105 वर्षों (1829-1934) तक वे जम्बूद्वीप में रहे और सकर्ता सिद्धांत की स्थापना करके, संसार में परंपरागत पूजा की व्यापकता और सगुण-निर्गुण सिद्धांत को दर्शाया! चैतन्य अंश जो शरीर की चेतना का कारण है और अंशी जो ब्रह्मांड की सभी उत्पत्ति का कारण है, उसकी सही पहचान देते हुए कैवल ज्ञान से भरपूर विभिन्न ग्रंथों सहीत आरती, स्तुति, भजन, गोडीपद आदि रचना की है। सर्जनहार द्वारा कुलमुखत्यारनामा प्राप्त करने वाले ओर संपूर्ण ब्रह्मांड में अंश को कैवलकर्ता के साथ जोड़ने वाले वे एकमात्र परमगुरु हैं। उन्होंने अंश को पंचमी अखंड कैवल मुक्ति के लिए प्रकट जाप और गुप्त अमरमंत्र दिया है। जिसकी सहायता से मनुष्य जन्म व मृत्यु के संकट से सदैव के लिए मुक्त हो सकता है। वह सृष्टिकर्ता का परम विशेष पाटवी अंश है और कैवलकर्ता ने उसे नौ बुद्धि और सोलह विभूतियों से विभूषित करके दिव्य शरीर के साथ ब्रह्मांड में भेजा है। कैवलकर्ता ने संसार के देवी-देवताओं को एक एक करुणा देकर करुणामय बनाया है। जब कर्ता ने समस्त करुणा प्रदान करके परम विशेष अंशको करुणाओ के सागर बनाया गया। कैवलवेत्ता पुरूष( कुवेर स्वामी ) ने सरसा, ता-जी: आणंद में गुरूगादी की स्थापना की ! ब्रह्मा के पांचवें मुख का संहार होनेके बाद लुप्त ज्ञान को प्रकट करते हुए "पंचम स्वसंवेद" की रचना की !दुनिया को नेतिपद से पर परमपद को प्राप्त करने का सही और उचित मार्ग दिखाने वाले दिव्य परमगुरु श्रीमत करुणासागर हैं।
कर्ता का पंच विशेषण आद्य, सक्रत, स्वराज, करुणेश और कैवल ये निज कर्ता के पांच विशेषण हैं। आद्य:- आद्य का अर्थ है जो पहले स्वयं था और उससे पहले कोई और नहीं था इसीलिए हम उसे सबसे आद्य कहते हैं। जिस प्रकार महद शून्य से पहले कुछ भी नहीं था, उसी प्रकार शून्य ही आदिम सत्य सही ! किन्तु बिना जाणके जड़ का जड ही है।जब आद्य कर्ता तो सजाण जाण सहित सचेत है!
सकर्ता:- परमाणु से लेकर स्थावर-जंगम सभी घाटों में रहने वाले अंशों का वह स्वयं कर्ता है। सभी घाटो के प्रथम बीजका कोई और कर्ता नहीं था। सर्व के सर्जन करनेवाले वह ख़ुद ही है , इसलिए उसको सकर्ता विशेषण उचित है। स्वराज:- समस्त ब्रह्माण्ड ओर अनंत देवताओं से लेकर सभी जीव जंतु अपनी ही (कैवल)आज्ञा का पालन करते है । आदि, अन्त, मध्य और चराचर के सम्बन्ध में अन्य कोई आज्ञा करने वाला प्रवर्तन नहीं है। स्वराज का मतलब ख़ुद स्वशासीत है । लेकिन कीसीका दीया हुआ सासन नहीं है ।इसीलिए हम उन्हें स्वराज कहते हैं। करुणेश :- स्वयं ही सभी प्राणियों को मोक्ष देनेवाले वही है फिर भी कोई उना गुण ( उपकार) देखते हुए उनके सामने कोई नहीं टिकता। फिर भी, वे सभी का पालन-पोषण और देखभाल करते हैं। साथ ही, सभी देवताओंमें, सर्व देवता ओ में जो देव अधिक विभूति वाले हैं वह अल्प विभूति वाले प्राणियों पर दया करता है । केवलकर्ता ने स्वयं सूर्य, चंद्रमा, इंद्र ओर मारुत आदि देवता ओ को एक एक करुणा प्रदान कि है । सभी करुणा ओ का ईश स्वयं ही है। इसलिए हम उन्हें करुणेश कहते हैं. कैवल:- कर्ता ने अपने संकल्प द्वारा जो उत्पन्न किया है वह सभी वल पोखकर किया है! लेकिन यह खुद वल के बीना है । ओर उनको वल की कोई गुंजाइश हे ही नहीं । जैसे कोई स्त्री चरखा चलाकर रुइ कातती है, फिर भी उसे हाथमे वल नहीं लगता । इसी प्रकार, निजकर्ता ने सभी उत्पत्ति की रचना वल भरके रचना की है । लेकिन स्वयं वल के बिना रहते है। साथ ही, जिस तरह कुम्हार (कुलाल) चाक (चकड़ा) घुमाकर कई बर्तन वल भरके बनाते है, लेकिन हाथ में वल नहीं लगता। इसी प्रकार कर्ता भी अपना संकल्प रूप हस्त से वल भरके सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रचना करते है, परन्तु स्वयं वल से रहित रहते है। ख़ुद को वल हे ही नहीं , इसलिए हम उन्हें कैवल कहते हैं।